हिंदी विंदी

“मां….. यह हिंदी कितनी कॉन्प्लिकेटेड है ,बड़ी ई की मात्रा या छोटी इ की , और ग्रामर भी बहुत टफ है ,क्यों पढ़ाते हैं यह सब्जेक्ट ? इससे अच्छा होता की कोई फॉरेन लैंग्वेज ही सिखा देते ,कम से कम हम मार्क्स स्कोर कर सकते थे। यह हिंदी तो बहुत ही बोरिंग है।” अंग्रेजी बोलना पढ़ना या लिखना बुरा नहीं है, पर हिंदी की उपेक्षा गलत है।

आठवीं में पढ़ने वाली मीरा अक्सर ही हिंदी को कोसती है, और मीरा ही क्यों ?आपको गाहे-बगाहे बच्चे हिंदी से बचते बचाते नजर आएंगे।
 फब्तियां और व्यंग के अलावा हमें यह समझना होगा कि यह छोटी सी शिकायत आने वाले दिनों में समस्या के रूप में विकराल रुप ले लेगी। यह बच्चे हमारे समाज हमारे देश का कल हैं, पर अगर हम आज की स्थिति देखें तो आने वाले कल में हिंदी का भविष्य बहुत अच्छा नहीं है। भाषा कोई भी बुरी नहीं है, या मैं अंग्रेजी विरोधी नहीं हूं पर हिंदी हम हिंदुस्तानियों की पहचान है ,और हमारी सभ्यता को जीवित रखे हुए हैं।
 यहां हम पालकों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है, मैं एक सवाल पूछना चाहती हूं, कि आखिर अंग्रेजी क्या है? तो आप जवाब देंगे कि अंग्रेजी एक भाषा है, पर समस्या यहीं है अंग्रेजी सिर्फ भाषा नहीं बल्कि स्टेटस सिंबल बन गई है, अंग्रेजी बोलने लिखने या सुनने को हमने सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ लिया है। अगर आप अंग्रेजी बोलते हैं, तो ही समाज में आप की पूछ परख होगी। हम सब यही सोचते हैं, और इतना ही नहीं हमने अपने बच्चों को भी यही घुट्टी पिलाई है।
 बात यहां सिर्फ अंग्रेजी की ही नहीं बल्कि हिंदी की भी है ,जहां एक ओर अंग्रेजी स्टेटस सिंबल है तो हिंदी बोलने को पुराने जमाने का या रुढ़िवादी माना जाता है।
बच्चों को अक्सर हिंदी मुश्किल और अंग्रेजी आसान लगती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह ज्यादा इस्तेमाल अंग्रेजी का कर रहे हैं और हम भी उन्हें ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। हमने ही हमारे बच्चों को हिंदी से दूर किया है । जब कोई विदेशी अपनी टूटी-फूटी हिंदी में थोड़ा भी कुछ कह दे तो हमें अच्छा लगता है तो फिर हम अपने बच्चे को क्यों नहीं हिंदी बोलने, पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते ?
 हिंदी बोलने में शर्म महसूस ना करें । किसी भाषा के प्रयोग को सामाजिक मान अपमान या रूढ़ियों से ना जोड़ें ।
बच्चों को ऐसे करें प्रोत्साहित
१. हिंदी, हिंदी या देवनागरी लिपि में ही लिखने के लिए कहें क्योंकि बच्चे हिंदी लिखते तो हैं, पर अंग्रेजी में।
२. हिंदी की किताबों से उनकी दोस्ती कराएं ।३. घर में जहां तक हो सके अपने बच्चों से मातृभाषा या हिंदी में बात करें।
४.  हिंदी की अशुद्धियों पर भी ध्यान दें। हिंदी में मात्राओं और व्याकरण की गलतियां नहीं होनी चाहिए।
५.  उन्हें हिंदी भाषी होने पर गर्व महसूस करवाएं ।
याद रखिए किसी भी अन्य देश में फिर वह जर्मनी हो चाइना हो या फिर रशिया, अंग्रेजी या किसी भी विदेशी भाषा को दूसरा स्थान दिया गया है। उनकी प्राथमिकता उनकी अपनी भाषा होती है । तो हिंदुस्तान में हिंदी को  विदेशी ना बनने दें ।अपने बच्चों को हिंदी की खूबसूरती से मिलाएं ,ताकि आने वाले समय में हमें भविष्य के प्रेमचंद ,शिवानी या शरतचंद्र मिले।।